Insaniyat Shayari in Hindi | सबसे बेहतरीन इंसानियत शायरी

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Insaniyat Shayari in Hindi

न हम अच्छे न तुम अच्छे रहा कोई न अब अच्छा,
मगर अच्छा रहे हम-तुम अगर अच्छाइयाँ सीखें।

इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता,
कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ।

आइना कोई ऐसा बना दे, ऐ खुदा जो,
इंसान का चेहरा नहीं किरदार दिखा दे।

ख़त जो लिखा मैनें इंसानियत के पते पर,
डाकिया ही चल बसा शहर ढूंढ़ते ढूंढ़ते।

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इल्म-ओ-अदब के सारे खज़ाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।

पहले जमीन बंटी फिर घर भी बंट गया,
इंसान अपने आप मे कितना सिमट गया।

जन्नत में सब कुछ है मगर मौत नहीं,
धार्मिक किताबों में सब कुछ है मगर झूठ नहीं,
दुनिया में सब कुछ है लेकिन सुकून नहीं,
इंसान में सब कुछ है मगर सब्र नहीं।

दिल के मंदिरों में कहीं बंदगी नहीं करते,
पत्थर की इमारतों में खुदा ढूंढ़ते हैं लोग।

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Insaniyat Shayari

जिन्हें महसूस इंसानों के रंजो-गम नहीं होते,
वो इंसान भी हरगिज पत्थरों से कम नहीं होते।

चंद सिक्कों में बिकता है इंसान का ज़मीर,
कौन कहता है मुल्क में महंगाई बहुत है।

राह में बैठा हूँ मैं तुम संग-ए-रह समझो मुझे,
आदमी बन जाऊँगा कुछ ठोकरें खाने के बाद।

ना महलों में ख़ामोशी ना फूटपाथ पर,
क़ब्रिस्तान में ख़ामोशी से लेटे अनेक है।

तुझे शिकायत है कि मुझे बदल दिया है वक़्त ने,
कभी खुद से भी तो सवाल कर, क्या तू वही है।

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे।

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फितरत सोच और हालात में फर्क है वरना,
इन्सान कैसा भी हो दिल का बुरा नहीं होता।

दो-चार नहीं मुझको बस एक दिखादो,
वो शख़्स जो बाहर से भी अन्दर की तरह हो।

बहुत से कागज़ मिल जाते हैं एक खासियत बेच कर,
लोग पैसा कमाते हैं आज कल इंसानियत बेच कर।

इल्म-ओ-अदब के सारे खजाने गुजर गए,
क्या खूब थे वो लोग पुराने गुजर गए,
बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।

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घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला।

हर वक़्त नया चेहरा हर बार नया वजूद,
आदमी ने आईने को भी हैरत में डाल दिया है।

ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़,
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम।

उपदेश से स्वभाव नहीं बदला जा सकता,
गरम किया हुआ पानी फिर शीतल हो जाता है।

एक तरफ उसे मुकद्दर कहते हैं जहान का,
एक तरफ मोल करते हैं उसके लाए सामान का।

बाकी है बस जमीं पे आदमी की भीड़,
इंसान को मरे हुए तो ज़माने गुजर गए।

दुश्मन बने दुनिया तो इतना याद रखना मेरे दोस्त,
तेरा यार जिन्दा है तो तेरा हथियार जिन्दा है।

ज़मीर जाग ही जाता है अगर ज़िन्दा हो इक़बाल,
कभी गुनाह से पहले तो कभी गुनाह के बाद।

जिस्म की सारी रगें तो स्याह खून से भर गयी हैं,
फक्र से कहते हैं फिर भी हम कि हम इंसान हैं।

जो मदद कर दे बिना मज़हब देखे आज की तारिख में वो फरिश्ता है,
भूल गए हैं सभी सबसे बढ़कर इंसान से इंसान का रिश्ता है।

बेदिली को चलो दिलों से निकाला जाए,
फिर किसी खवाब को पलकों में संभाला जाए।

आग नफ़रत की झोपड़ों को जला डालेगी,
रख मोहब्बत की शमा दिल तक उजाला जाए।

हम खुदा थे गर न होता दिल में कोई मुद्दा,
आरजूओं ने हमारी हमको बंदा कर दिया।

इंसानियत की राह पर तुम्हें चलना होगा,
ठोकरें खा कर भी तुम्हें संभलना होगा।

सच्चाई थी पहले के लोगों की जुबानों में,
सोने के थे दरवाजे मिट्टी के मकानों में।

मुक़ाम वो चाहिए कि जिस दिन हारु,
जीतने वाले से ज़्यादा चर्चे मेरी हार के हों।

कामियाबी ऊपर और इंसानियत नीचे रह गई,
पैसे कमाने की ख्वाहिश में इंसानियत कहीं पीछे रह गई।

आओ अपनी ज़रूरतों को मुख़तसर कर लें,
कोई रूखा सही पर उन तक निवाला जाए।

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